मुंबई में फंसे हुए माइग्रेंट वर्कर्स के लिए, सोशल वर्कर शांति सिंह चौहान का इनिशिएटिव एक राहत की तरह है। लोगों की मदद के लिए चौहान और उनकी टीम फंड्स इकट्ठा करती है, खाने का पैकेज खरीदती है और जरूरतमंदों को बाँट देती है, कभी-कभी ये काम करते हुए आधी रात भी हो जाती है । लोकल सपोर्ट के साथ, वह गोरेगांव, फोर बंगलों, वर्सोवा, बांद्रा पूर्व, नवापाड़ा और भारत नगर में वर्कर्स को ज़रूरी सामान दे रही हैं। इसके अलावा, वह 5,500 से अधिक माइग्रेंट फैमिलीज़ के लिए भोजन अरेंज कर रही हैं.

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चौहान का मानना ​​है कि जब तक महिलाओं में आग है, तब तक वो कुछ भी हासिल कर सकती हैं।

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आइये जानते हैं उनकी कही हुई कुछ और बातें:

  • मैं सभी लड़किओं को ये कहना चाहूंगी की अपने सपनों पे विशवास रखो। चाहे वह हमारा खुद का कैफे चलाना हो, एक अभिनेत्री बनना या कुछ भी जो आपको खुश करे। एक बार जब आप अपने सपने को पहचान लेते हैं, तो मैक्सिमम पोटेंशियल तक इसका पीछा करें।
  • मैं एक शेफ हूं और मेरी छोटी बेटी ने भी यही करियर चुना है। वह भी एक शेफ बनना चाहती है। लेकिन मेरी बड़ी बेटी ने मुझे बताया कि वह वकील बनना चाहती है। मैं उसके फैसले से बहुत खुश हूँ और यही बात मैं उन सभी लड़कियों को बताना चाहती हूं, अपने अंदर की आग कभी बुझने ना दे।
  • मुझमें एक माँ भी है जो लोगों को भूखा नहीं देखना चाहती। मैं मदद नहीं कर सकती लेकिन आगे बढ़कर उन्हें खिलाने के लिए प्रोविज़न ज़रूर बना सकती हूँ।
  • मुझे मुंब्रा से कॉल आया, ठाणे में दो भाई और चार बंगलों में एक नौकर फंसे थे। फिलहाल, मैं इन कठिन समय के दौरान इन सभी लोगों की मदद करके बहुत संतुष्ट महसूस करती हूं।
  • मैंने महसूस किया है कि हमें किसी के आने और मदद करनेका इंतज़ार नहीं करना चाहिए, खुद बाहर जाएं और यह देखें की आप खुद से क्या अरेंज कर सकते हैं।
  • हर दूसरे व्यक्ति की तरह, जब ये महामारी भारत में आयी तो मैं भी घबरा गयी। मैं अपने परिवार के लिए डरी हुई थी और पक्का किया की सभी लोग घर में रहे और सेफ रहे। लेकिन एक बार जब मुझे एसओएस कॉल मिलना शुरू हुआ तो मैंने बाहर जाकर मदद करने का फैसला किया।

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