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Photograph: (Instagram / Sujata Biswas)
दिल्ली के बाहर एक गांव में, एक महिला अपने ब्लाउज़ के अंदर वॉश-केयर (wash-care) लेबल के पास सिला एक छोटा सा पिंक टैग (pink tag) देखती है। यह कोई अलार्म नहीं, कोई डर पैदा करने वाला संदेश नहीं—बस एक साइलेंट रिमाइंडर है। कैसे खुद को एक्सामिने करना है, किन बातों पर ध्यान देना है। यही है नेटवर्क18 संजीवनी – पिंक टैग प्रोजेक्ट (Pink Tag Project:) का मकसद: जागरूकता को रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बनाना।
कपड़े का छोटा सा टुकड़ा, बड़ी उम्मीद: ‘पिंक टैग प्रोजेक्ट’ कैसे बचा रहा है ज़िंदगियां
भारत में हर चार मिनट में एक महिला को ब्रेस्ट कैंसर (breast cancer) का पता चलता है, और 70% से ज़्यादा मामलों में इसकी पहचान देर से होती है। कारण साफ है—अवेयरनेस की कमी, स्क्रीनिंग में देरी और सबसे बड़ा कारण, महिलाओं का खुद को आख़िरी प्राथमिकता देना। घर और काम की जिम्मेदारियों के बीच सेल्फ-केयर अक्सर पीछे छूट जाती है।
एक आसान लेकिन असरदार विचार
पिंक टैग प्रोजेक्ट एक सिंपल आईडिया से शुरू हुआ: हर महिला दिन में एक पल ऐसा बिताती है जब वह अकेली होती है—तैयार होते टाइम। उसी पल को अवेयरनेस का मेडियम बना दिया गया। कपड़ों में सिले छोटे पिंक टैग पर ब्रेस्ट सेल्फ-एग्ज़ाम के आसान स्टेप्स दिए गए हैं। यह एक प्रैक्टिकल “नज” है—जो बिना डर के, बिना प्रेशर के, महिलाओं को अपनी सेहत पर ध्यान देने की याद दिलाता है।
शुरुआत रूरल इंडिया में लोकल टेलर्स और कम्युनिटी नेटवर्क के साथ हुई। ट्रस्टेड फेसेस और लोकल टेलर्स ने इस पहल को जमीन पर उतारा। धीरे-धीरे यह विचार एक बड़े मॉडल में बदल गया।
ट्रेडिशन और मकसद का मेल
अब यह पहल फैशन ब्रांड सुता के ज़रिए मेनस्ट्रीम तक पहुंच रही है। सुता, जो मॉडर्न इंडियन महिलाओं के लिए साड़ी को नए अंदाज़ में पेश करता है, अपने ब्लाउज़ में पिंक टैग को शामिल कर रहा है। यह सिर्फ एक लेबल नहीं, बल्कि केयर का संदेश है—यह याद दिलाता है कि महिला की हेल्थ भी उतनी ही ज़रूरी है जितनी उसकी जिम्मेदारियां।
सुता की को-फाउंडर सुजाता बिस्वास कहती हैं, “अगर एक ब्लाउज़ किसी महिला को अपनी हेल्थ पर ध्यान देने की याद दिला सकता है, तो फैशन सिर्फ कपड़े नहीं, बदलाव का माध्यम बन सकता है।” वहीं तानिया बिस्वास के मुताबिक, “ड्रेसिंग का पल निजी होता है। उसी पल में यह छोटा सा टैग मौजूद रहकर कहता है—आप मायने रखती हैं।”
मीडिया से व्यवहार बदलाव तक
The Pink Tag carries simple breast self-check steps, stitched into everyday clothing.
— SanjeevaniNews18FederalBank (@Sanjeevani_Nw18) January 28, 2026
Four simple checks.
One powerful habit.
Early detection can save lives. #Sanjeevani#PinkTagProject#UnitedAgainstCancer#BreastCancerAwareness#BreastCancer
To know more please visit:… pic.twitter.com/i6VETMyuMi
News18 स्टूडियोज़ के COO सिद्धार्थ सैनी के अनुसार, यह पहल ट्रेडिशनल अवेयरनेस काम्पैग्न्स से आगे बढ़ती है। यह संदेश सिर्फ स्क्रीन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि रोज़मर्रा की जिंदगी में शामिल हो जाता है। बार-बार दिखने वाला यह छोटा संकेत धीरे-धीरे आदत में बदल सकता है—और यही असली बदलाव है।
एक इंडस्ट्री ब्लूप्रिंट(Industry Blueprint)
पिंक टैग प्रोजेक्ट दिखाता है कि फैशन इंडस्ट्री सिर्फ ट्रेंड्स नहीं बना सकती, बल्कि पब्लिक हेल्थ में भागीदार भी बन सकती है। साड़ी ब्लाउज़ जैसे पारंपरिक परिधान में यह छोटा सा इंटीग्रेशन एक बड़ा उदाहरण है—कैसे डिजाइन और सोशल रिस्पांसिबिलिटी साथ चल सकते हैं।
आगे की राह
आज पिंक टैग लाखों कपड़ों में सिला जा रहा है। यह पहल फैशन ब्रांड्स, मैन्युफैक्चरर्स और D2C प्लेटफॉर्म्स को एक संदेश देती है—इनोवेशन सिर्फ प्रोडक्ट में नहीं, सोच में भी होना चाहिए।
कपड़े का यह छोटा सा टुकड़ा हमें याद दिलाता है कि बदलाव हमेशा बड़े मंच से नहीं आता। कभी-कभी वह चुपचाप, हमारे सबसे निजी पलों में, हमें खुद से मिलने का मौका देता है। और शायद यही उम्मीद की सबसे मजबूत शुरुआत है।
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