Mothers Don’t have their own friends: मम्मियों के दोस्त क्यों नहीं?

Rajveer Kaur
05 Nov 2022
Mothers Don’t have their own friends: मम्मियों के दोस्त क्यों नहीं?

Mothers Don’t have their own friends

भारतीय समाज ऐसा हैं यहाँ पर बस शादी के बाद औरत की ज़िंदगी रसोई, बच्चे, पति और परिवार तक सीमित होनी चाहिए। उसकी पर्सनल ज़िंदगी पर कोई सवाल नहीं उठता कि उसको ज़िंदगी में क्या चाहिए? उसकी क्या प्राथमिकताएँ है? वह अपनी लाइफ़ में क्या चाहती है? भारतीय शादी एक तरह से औरत की ज़िंदगी पर ‘Full Stop’ है। जिसका मतलब उसकी आगे कोई लाइफ़ नहीं है, ना तो कोई उसके शौक है। समाज यह ही चाहता हैं कि औरत अपनी सारी ज़िंदगी अपने परिवार और बच्चों को सम्पर्पित कर दे।

Mothers Don’t have friends of their own: मम्मियों के दोस्त क्यों नहीं?

दोस्त की जगह ‘सिस्टर’ 
जब भी आपकी मधर ने कहीं बाहर जाना हो तब सबसे पहले वे अपनी बहन को कॉल करती हैं अगर बहन नहीं तो 'ननद' या फिर अपनी मम्मी को। इसके अलावा अगर उसने कहीं घूमने जाना तब भी वह अपने पति को कहेगी या बच्चों या फिर बहन से । इन सब में जो दोस्ती का रिश्ता है वे कहीं खो जाता हैं। अगर उसने कोई दिल की भी बात करनी हो उसके पास अपनी बहन और माँ के अलावा कोई दूसरा ऑप्शन नहीं होता हैं।

'मॉम' की दोस्त पापा के दोस्तों की पत्नियाँ 
बहुत दफ़ा आप ऐसा देखते होंगे कि आम घरों में जो मम्मियाँ होता हैं उनकी दोस्त या तो पापा के दोस्तों की पत्नियाँ होता हैं। इसके साथ ही या फिर उनके बच्चों की मम्मियाँ होता है। मुख्य बात यह हैं कि मम्मियाँ की कॉलेज वाली दोस्त या फिर जो अपने दोस्त वे शादी के बाद नहीं रहते है क्योंकि शादी, बच्चे और परिवार का इतना प्रेशर हो जाता हैं कि दोस्तों के साथ मिलने या बात करने का वख्त नहीं मिलता हैं जिस कारण फिर दोस्तों से सम्पर्क टूट जाता हैं।

मर्दों के साथ ऐसा नहीं 
यह स्थिति मर्दों के साथ नहीं होता हैं। शादी के बाद उनकी ज़िंदगी में कोई बदलाव नहीं आता है। वे हमेशा अपनी लाइफ़ अपनी शर्तों पर जीते हैं। उन पर बच्चों को पालने, परिवार की ज़िम्मेदारी ऐसा कुछ नहीं होता हैं। उन्हें औरतों के मुक़ाबले बहुत कम कॉम्प्रॉमायज़ करने पड़ते हैं। हमेशा बंदिश औरतों पर लगती हैं।

अपनी लाइफ़ जीना मत छोड़े 
आप अपनी लाइफ़ को जीना मत छोड़े। बेशक, समाज आप पर बच्चों, परिवार और पति का प्रेशर का डालेगा लेकिन आपने उसे लेकर अपनी ज़िंदगी को नहीं रोकना हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि शादी होगी तो औरत को अपने बारे में सोचना नहीं हैं। शादी दो लोगों के बीच होती है तो ज़िम्मेदारियाँ भी दोनों की बनती हैं। इसलिए कभी भी औरतें अकेले सब कुछ कॉम्प्रोमायज़ मत करें

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