Patriarchy: क्यों यह कहा जाता है पढ़ी लिखी बहु बेटे के लिए बुरी है?

Rajveer Kaur
11 Oct 2022
Patriarchy: क्यों यह कहा जाता है पढ़ी लिखी बहु बेटे के लिए बुरी है?

हमारे समाज में आज भी शादी को लेकर लड़की के बहुत सी चीजें देखी जाती है जैसे कि वह कितनी पढ़ी लिखी है, घर का काम जानती है, ज़्यादा बोलती तो नहीं, अपने हक़ों के लिए तो नहीं बोलती, बढ़ो का आदर करती है, ज़्यादा दिमाग़ तो नहीं अपना चलाती। ऐसी और भी बहुत सी बातें देखी जाती है। इसका मतलब होता कि शादी के बाद लड़की कंट्रोल में ही रहे वह ज़्यादा सवाल ना करें।बस अपना कहा मानें।

समाज को कैसी बहु चाहिए?

लड़कियों को आज भी समाज नीचे हाई देखना चाहता है कि वह घर में रहे और साफ़ सफ़ाई करें, बर्तन माँझे, अपने पति, सास और ससुर की सेवा करें। उनके सामने ज़्यादा बात मत करें। अपना परामर्श भी ना दे। हमेशा उनकी ही सुने। उनको कोई शिकायत का मौक़ा नहीं दे। अगर उसके साथ कुछ ग़लत हो रहा है तो चुपचाप सहन करें। उनके विरोध में आवाज़ ना उठाए।अगर ऐसे टाक्सिक रिश्ते को तोड़ना चाहती है इसमें उसके परिवार की इज़्ज़त चले जाएगी। इसलिए वे इसे सहन करें।

पढ़ी लिखी बहु क्यों नहीं चाहिए?

पढ़ी लिखी बहु इसलिए नहीं चाहिए क्योंकि उन्हें यह डर है कि यह अपने हक़ों के प्रति जागरूक होंगी। उसे इन चीजों के बार जानकारी होंगी। वह ग़लत होने पर सवाल उठाएँगी। वह पित्तरसत्ता सोच के उलट जवाब देगी। वह अपने साथ कुछ भी ग़लत नहीं होने देगी। वह समाज के डर से चुप नहीं बेठेगी। वह बाहर जाकर नौकरी भी करेंगी। अपने बच्चों को भी अच्छी शिक्षा देंगी। इसलिए समाज पढ़ी लिखी बहु लाने से दरता है।

पित्तरसत्ता सोच आज भी हमारे घरों में है

आज 22वीं सदी आ चुक्की है। हम कहते है कि औरतों को उनके अधिकार मिल रहे है। आजकल की औरतें ड्रामा करती है। उनके साथ कुछ नहीं हो रहा है। लेकिन हम भूल जाते है या फिर ध्यान नहीं देते है कि औरत को पढ़ी लिखी होने के बवजूद भी परिवार के लोग नौकरी नहीं करने देते है। उसे घर पर रहने देते है।आज भी लोग लड़की को बोझ समझते है। उसे पैदा होते ही मार देते है। बहुत सी आज भी घरेलू हिंसा का शिकार होती है। हम कह रहे है औरतें आज़ाद है लेकिन आज़ादी दिखती तो नहीं है। आज औरतें ईरान में अपने हक्कों के लड़ रही है।

औरत को चाहे हमने पढ़ने का मौक़ा दे दिया है। फिर भी वह अपने तरीक़े से ज़िंदगी नहीं जी सकती। कभी परिवार की ज़िम्मेदारी, कभी बच्चों की अपने लिए तो वह समय  निकाल ही नही सकती है।हमें सोच बदलने की ज़रूरत है। उन्हें आगे बढ़ने के मौक़े देने की ज़रूरत है।

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