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Photograph: (freepik)
पीरियड्स एक नॉर्मल बायोलॉजिकल प्रोसेस है, फिर भी आज के मॉडर्न दौर में यह अब भी शर्म, चुप्पी और दूरी से जुड़ी हुई है। कई घरों में, महिलाओं को आज भी पीरियड्स के दौरान अलग बैठने के लिए कहा जाता है, कुछ चीज़ों को छूने से मना किया जाता है, और मंदिरों या किचन से दूर रखा जाता है। सवाल यह नहीं है कि यह रिवाज कब शुरू हुआ, बल्कि यह है कि यह सोच आज भी क्यों जारी है।
पीरियड्स में महिलाओं को आज भी छूने से परहेज़ क्यों किया जाता है?
1. शुद्धता और अशुद्धता की गहरी जड़ें
पीरियड्स को लंबे समय से अशुद्धता से जोड़ा गया है। यह सोच बिना किसी सवाल के पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है क्योंकि यह समाज में बहुत गहराई से बसी हुई है। महिला का शरीर जब हर महीने एक नेचुरल प्रोसेस से गुजरता है, तो उसे “अशुद्ध” मान लेना वैज्ञानिक नहीं, बल्कि सोशल कंडीशनिंग का नतीजा है।
2. जानकारी की कमी और डर
बहुत से लोगों को अब भी यह एहसास नहीं है कि पीरियड्स कोई बीमारी या इन्फेक्शन नहीं है। इग्नोरेंस ही इसकी जड़ है कि उन्हें छूने से "कुछ हो जाएगा।" जब सही जानकारी कम होती है, तो अफवाहें और मिथ सच की जगह ले लेते हैं। इसी वजह से, पीरियड्स से जुड़ी बातें आज भी फुसफुसाहट में होती हैं।
3. महिलाओं को कंट्रोल करने की सोच
पीरियड्स के दौरान लगाए गए रूल्स अक्सर महिलाओं की फ्रीडम कम कर देते है। सब कुछ तय होता है, यहाँ तक कि कहाँ बैठना है, और किसे छूना है। जब महिलाएं पीरियड्स में होती हैं, तो उनसे दूरी बनाना एक सोच है, और किसी भी सोच को बदला जा सकता है। सवाल बस यह है कि हम बदलाव का हिस्सा बनना चाहते हैं या चुप्पी का।
4. इमोशनल असर जिसे नज़रअंदाज़ किया जाता है
जब किसी महिला को लगातार यह याद दिलाया जाता है कि वह "अलग" है, तो इसका असर उसके बॉडी और मन दोनों पर पड़ता है। शर्म, पछतावे और अकेलेपन के इमोशंस के कारण वह धीरे-धीरे अपना सेल्फ कॉन्फिडेंस खो देती है। पीरियड्स का पैन फिजिकल होने के साथ-साथ मेंटली भी हो जाता है।
5. बदलाव की ज़रूरत
आज के समाज में पीरियड्स पर खुलकर बात होनी चाहिए। बेटियों और बेटों, दोनों को यह पता होना चाहिए कि पीरियड्स कोई गंदी चीज़ नहीं, बल्कि एक नॉर्मल बायोलॉजिकल प्रोसेस है। छूने से परहेज़ नहीं, समझ और सम्मान ज़रूरी है।
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