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Photograph: Via (SheThePeopletv)
उम्र बढ़ने के साथ महिलाओं के जीवन में कई शारीरिक और भावनात्मक बदलाव आते हैं, लेकिन इन पर खुलकर बातचीत कम होती है। खासकर 40 की उम्र के बाद होने वाले बदलाव और मेनोपॉज़ को अक्सर चुप्पी में ही जी लिया जाता है। बेंगलुरु में आयोजित Fabulous Over Forty कार्यक्रम में अमृता बेंद्रे ने इन विषयों पर ईमानदारी से बात की। उन्होंने बताया कि 40 की उम्र उनके लिए आत्मस्वीकार, समझ और जीवन को नए नजरिए से देखने का समय रही है।
चालीस की उम्र, नई समझ: Amruta Bendre ने साझा की आत्मविश्वास और ग्रोथ की कहानी
चालीस से पहले की दौड़ और दबाव
उन्होंने अपनी यात्रा को याद करते हुए बताया कि 40 से पहले का समय खुद को साबित करने और हर भूमिका को परफेक्ट तरीके से निभाने के दबाव में बीता। करियर, परिवार और समाज के बीच संतुलन बनाते हुए कई बार उन्होंने अपनी जरूरतों को नजरअंदाज किया। उस समय गलतियों का डर भी ज्यादा था और असफलता को स्वीकार करना कठिन लगता था।
गलतियों से सीखने की सोच
कार्यक्रम में अमृता की एक बात सभी को प्रेरित कर गई। उन्होंने कहा,
“Before 40, I was scared of mistakes. Now I love making mistakes.”
इस विचार को समझाते हुए उन्होंने बताया कि अब वे गलतियों को सीखने और आगे बढ़ने का हिस्सा मानती हैं। उनके अनुसार यही सोच आत्मविश्वास को मजबूत बनाती है और जीवन में नए अवसरों को अपनाने की हिम्मत देती है।
मेनोपॉज़ पर खुली बातचीत की जरूरत
अमृता ने मेनोपॉज़ को लेकर जागरूकता की कमी पर भी बात की। उन्होंने कहा कि 40 के बाद महिलाओं के शरीर में होने वाले हार्मोनल बदलाव स्वाभाविक हैं, लेकिन इनके बारे में जानकारी और खुली बातचीत बेहद जरूरी है।
उन्होंने साझा किया कि मेनोपॉज़ से जुड़े शारीरिक बदलाव , मूड स्विंग और थकान कई महिलाओं के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं। ऐसे में परिवार और समाज का सहयोग महिलाओं के आत्मविश्वास को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाता है।
मन और शरीर के संतुलन पर ध्यान
अमृता के अनुसार इस उम्र में मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य का संतुलन बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है। उन्होंने महिलाओं को सलाह दी कि नियमित देखभाल, सही खानपान और भावनात्मक स्वास्थ्य पर ध्यान देना आत्मविश्वास बनाए रखने में मदद करता है।
उन्होंने यह भी कहा कि शरीर में बदलाव को स्वीकार करना ही असली आत्मविश्वास की पहचान है।
समाज की सोच बदलने की जरूरत
अमृता ने इस बात पर जोर दिया कि महिलाओं की उम्र और मेनोपॉज़ को लेकर समाज में मौजूद झिझक को खत्म करना जरूरी है। उनके अनुसार यह जीवन का स्वाभाविक चरण है, जिसे शर्म या डर से नहीं बल्कि समझ और सहयोग के साथ अपनाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि 40 के बाद महिलाएँ अपने सपनों, रुचियों और जीवन के नए लक्ष्यों को अधिक स्पष्टता से पहचान पाती हैं।
महिलाओं के लिए प्रेरणादायक संदेश
अंत में अमृता ने महिलाओं को अपने हर जीवन चरण को स्वीकार करने और बदलाव से डरने की बजाय उसे अपनाने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि आत्मविश्वास, अनुभव और स्वयं से प्रेम ही जीवन को संतुलित और खुशहाल बनाते हैं।
Fabulous Over Forty कार्यक्रम में अमृता बेंद्रे की बातचीत यह दर्शाती है कि 40 की उम्र ठहराव नहीं, बल्कि आत्मस्वीकार और नई संभावनाओं की शुरुआत है। मेनोपॉज़ जैसे विषयों पर खुलकर बात करना महिलाओं को न केवल जागरूक बनाता है, बल्कि उन्हें मानसिक रूप से मजबूत भी करता है। उनकी कहानी यह प्रेरणा देती है कि हर उम्र में खुद को अपनाकर जीवन को पूरे आत्मविश्वास के साथ जिया जा सकता है।
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