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Illusion of Beauty: हम लड़कियों को खूबसूरत बनना क्यों सिखाते है?

ओपिनियन: समाज में लड़कियों को सुंदरता का मानक बनाना एक पुरानी और गहरी समस्या है। इसके कई सामाजिक, सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक पहलू हैं। आइए, इस विषय को विस्तार से समझें और जानें कि आखिर क्यों हम लड़कियों को सुंदर बनना सिखाते हैं।

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Trishala Singh
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Illusion of Beauty

(Credits: Pinterest)

Why Are Girls Taught to Be Beautiful: हमारे समाज में एक विचित्र धारणा फैली हुई है कि केवल गोरी त्वचा वाली लड़कियां ही सुंदर होती हैं। इस सोच के कारण, बचपन से ही लड़कियों को गोरी त्वचा का होना अधिक अहमियत दी जाती है। गोरी त्वचा को कोमलता और सुंदरता का प्रतीक माना जाता है, जिससे सामाजिक मान्यता मिलती है। लेकिन क्या यह सोच सही है? क्या रंग ही किसी के मिजाज को तय कर सकते हैं? गोरी त्वचा के अलावा भी हर रंग की त्वचा में समान सौंदर्य और महत्व है। असल में, सौंदर्य तो वही होता है जो आत्म-प्रेम, सहानुभूति, और आत्म-सम्मान के साथ आता है, और यह किसी भी रंग के बाहर है। इसलिए, हमें समाज को गोरी त्वचा के माध्यम से सौंदर्य की नई परिभाषा सिखाने की आवश्यकता है, जो समानता, सम्मान, और स्वतंत्रता के साथ जुड़ी हो।

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Illusion of Beauty: हम लड़कियों को खूबसूरत बनना क्यों सिखाते है?

पिछले कई सदियों से, समाज ने सुंदरता को महिलाओं की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता माना है। ऐतिहासिक रूप से, महिलाओं का मूल्य अक्सर उनकी शारीरिक सुंदरता और आकर्षण से मापा जाता था। यह मान्यता इतनी गहरी है कि इसे बदलना आज भी चुनौतीपूर्ण है।

सांस्कृतिक मान्यताएँ

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कई संस्कृतियों में, महिलाओं की सुंदरता को उनके सामाजिक और वैवाहिक जीवन की सफलता के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। उदाहरण के लिए, भारतीय संस्कृति में एक लड़की की सुंदरता उसकी शादी की संभावनाओं से जोड़ दी जाती है। इससे महिलाओं पर सुंदर दिखने का दबाव बनता है।

टीवी, फिल्मों, फैशन पत्रिकाओं और सोशल मीडिया ने भी सुंदरता के मानकों को और मजबूत किया है। मीडिया में महिलाओं को अक्सर एक विशेष रूप में दिखाया जाता है – पतली, गोरी, और निर्दोष त्वचा वाली। यह एक असली और असंभव आदर्श है, लेकिन फिर भी, इससे प्रभावित होकर लड़कियां और महिलाएं खुद को उसी सांचे में ढालने का प्रयास करती हैं।

विज्ञापनों में दिखाए जाने वाले सुंदरता उत्पादों और सेवाओं का भी बड़ा प्रभाव होता है। कंपनियाँ महिलाओं को सुंदरता के आदर्श मानकों को पाने के लिए प्रेरित करती हैं, जिससे वे उनके उत्पाद खरीदें। इससे महिलाओं में सुंदर दिखने की चाह और बढ़ जाती है।

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पारिवारिक और सामाजिक दबाव

अक्सर परिवारों में लड़कियों को बचपन से ही सुंदर बनने और दिखने के लिए प्रेरित किया जाता है। उन्हें यह सिखाया जाता है कि सुंदरता ही उनके जीवन की सफलता का प्रमुख कारक है। इससे लड़कियों में आत्म-सम्मान और आत्म-विश्वास की कमी हो सकती है।

सामाजिक समारोहों और अवसरों पर लड़कियों और महिलाओं को अक्सर उनकी सुंदरता के आधार पर जज किया जाता है। इससे वे समाज की अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए सुंदर दिखने का दबाव महसूस करती हैं।

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आत्म-सम्मान और पहचान

सुंदरता के मानकों को पूरा करने की कोशिश करते-करते, लड़कियों का आत्म-सम्मान प्रभावित हो सकता है। वे अपनी असली पहचान को भूलकर समाज द्वारा थोपे गए मानकों को अपनाने लगती हैं। इससे उनके मानसिक स्वास्थ्य पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

महिलाओं को सिखाया जाता है कि उनकी पहचान उनकी सुंदरता से जुड़ी है। यह सोच उनकी स्वाभाविक पहचान को दबा सकती है। उन्हें यह समझना जरूरी है कि वे अपनी योग्यताओं, क्षमताओं और व्यक्तित्व के कारण मूल्यवान हैं, न कि केवल अपनी शारीरिक सुंदरता के कारण।

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बदलाव की दिशा में कदम

हमें लड़कियों को यह सिखाने की जरूरत है कि उनकी असली शक्ति उनकी योग्यताओं, सपनों और आत्म-सम्मान में निहित है। सुंदरता के पारंपरिक मानकों को तोड़कर, हमें महिलाओं को आत्म-स्वीकृति और आत्म-प्रेम की दिशा में प्रेरित करना चाहिए।

शिक्षा और जागरूकता के माध्यम से, हम समाज में सुंदरता के वास्तविक अर्थ को समझा सकते हैं। महिलाओं को उनके वास्तविक गुणों के आधार पर प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। 

मीडिया और विज्ञापन कंपनियों को महिलाओं की विविधता और वास्तविकता को प्रतिबिंबित करना चाहिए। सुंदरता के एकमात्र मानक को बढ़ावा देने के बजाय, उन्हें महिलाओं की सभी रूपों और आकारों को स्वीकार करना चाहिए।

हम लड़कियों को सुंदर बनना सिखाने के बजाय उन्हें आत्मसंस्थापन, आत्म-प्रेम और आत्म-सम्मान सिखाना चाहिए। उनकी असली पहचान उनकी योग्यताओं, सपनों और व्यक्तित्व में निहित है, न कि केवल उनकी शारीरिक सुंदरता में। समाज के हर वर्ग को इस दिशा में काम करने की जरूरत है ताकि महिलाएं अपनी असली शक्ति और पहचान को समझ सकें और उस पर गर्व कर सकें।

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