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Photograph: (freepik)
हमारे समाज में बचपन से ही लड़कियों को सिखाया जाता है कि वे “समझदार”, “समायोजित” और “सबको खुश रखने वाली” बनें। धीरे-धीरे यह सीख उनकी personality का हिस्सा बन जाती है। इसी वजह से कई महिलाओं के लिए “ना” कहना केवल एक शब्द नहीं, बल्कि एक भावनात्मक संघर्ष बन जाता है।
Setting Boundaries: ‘ना’ कहना महिलाओं के लिए इतना कठिन क्यों है?
1. Social Conditioning और Gender Role Theory
Gender Role Theory के अनुसार समाज लड़कों और लड़कियों के लिए अलग-अलग भूमिकाएँ तय कर देता है। लड़कियों को nurturing, polite और sacrificing बनना सिखाया जाता है। जब कोई महिला “ना” कहती है, तो उसे डर रहता है कि लोग उसे selfish, rude या attitude वाली समझेंगे। यह social conditioning इतनी गहरी होती है कि कई बार महिला अपनी इच्छा पहचान ही नहीं पाती। वह पहले दूसरों की जरूरत सोचती है, फिर खुद की।
2. Approval Seeking Behavior और Low Self-Esteem
कई महिलाओं में approval seeking tendency होती है। उन्हें लगता है कि अगर वे दूसरों को मना करेंगी तो लोग उन्हें छोड़ देंगे या उनसे नाराज़ हो जाएंगे। Low self-esteem भी एक बड़ा कारण है। जब व्यक्ति अपनी value को दूसरों की स्वीकृति से जोड़ देता है, तो “ना” कहना उसे असुरक्षित महसूस कराता है। वह सोचती है — “अगर मैंने मना किया तो क्या मैं बुरी इंसान हूँ?”
3. Fear of Rejection और Attachment Theory
Attachment Theory बताती है कि बचपन में बने रिश्तों का असर adulthood में भी पड़ता है। जिन महिलाओं ने बचपन में emotional neglect या rejection का अनुभव किया है, वे बड़े होकर rejection से ज्यादा डरती हैं। इसलिए वे conflict avoid करती हैं और boundary set करने से बचती हैं। उनके लिए “ना” कहना ऐसा लगता है जैसे वे रिश्ता खो देंगी।
4. Cognitive Distortions
CBT के अनुसार कई महिलाएँ cognitive distortions में फँस जाती हैं, जैसे:
Catastrophizing “अगर मैंने मना किया तो सब खराब हो जाएगा।”
Mind Reading “वो जरूर सोचेंगे कि मैं घमंडी हूँ।”
People Pleasing Schema “मुझे सबको खुश रखना ही है।”
ये सोच वास्तविकता से ज्यादा डर पैदा करती है।
5. Learned Helplessness
जब कोई महिला लंबे समय तक emotional abuse या controlling environment में रहती है, तो वह धीरे-धीरे learned helplessness विकसित कर सकती है। उसे लगता है कि उसकी आवाज़ की कोई कीमत नहीं है। ऐसी स्थिति में boundary बनाना उसे असंभव लगता है।
6. Assertiveness Skills की कमी
बहुत सी महिलाओं को assertiveness सिखाया ही नहीं जाता। Assertiveness का मतलब है अपनी बात शांति और सम्मान के साथ रखना। लोग अक्सर assertive होने को aggressive समझ लेते हैं, जबकि दोनों अलग हैं।Aggression में हम दूसरों की सीमा तोड़ते हैं, जबकि assertiveness में हम अपनी सीमा बताते हैं।
समाधान: Healthy Boundaries कैसे बनाएं?
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि “ना” कहना गलत नहीं है। यह self-care और mental health का हिस्सा है।
अपनी feelings को पहचानें।
छोटे छोटे situations में practice करें।
“I statements” का प्रयोग करें जैसे, “मुझे अभी आराम की जरूरत है।”
Guilt को challenge करें क्या सच में मैं गलत हूँ, या सिर्फ मुझे ऐसा सिखाया गया है?
जब महिला अपनी boundaries तय करती है, तो वह selfish नहीं बनती, बल्कि emotionally healthy बनती है।
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