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'औरत ही औरत की दुशमन' कितनी सच्चाई है इस कथन में

हम अक्सर औरतों के बारे में यह कथन सुनते हैं कि 'औरत ही औरत की दुश्मन है'। क्या आज तक किसी मर्द ने दूसरे मर्द को नापसंद नहीं किया या कोई एक मर्द दूसरे मर्द के खिलाफ कभी कुछ नहीं बोला?

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Mandie Panesar
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How Much Truth Is In This Statement Woman Is Woman's Enemy? (Image Credit: Pinterest)

How Much Truth Is In This Statement 'Woman is Woman's Enemy'?: हम अक्सर औरतों के बारे में यह कथन सुनते हैं कि 'औरत ही औरत की दुश्मन है'। जब भी कोई औरत किसी दूसरी औरत को नापसंद करती है या उसके खिलाफ कुछ बोलती है तो सब लोग इसी बात पर आ जाते हैं कि महिलाएं कभी अच्छी दोस्त नहीं बन सकतीं। क्या आज तक किसी मर्द ने दूसरे मर्द को नापसंद नहीं किया या कोई एक मर्द दूसरे मर्द के खिलाफ कभी कुछ नहीं बोला? आज तक जितने युद्ध और लड़ाइयां इस दुनिया में हुई हैं, क्या वो सब औरतों के बीच हुईं?

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'औरत ही औरत की दुशमन' कितनी सच्चाई है इस कथन में?

आज हम बात करेंगे कि क्यों आज भी इस स्टेटमेंट को बढ़ावा मिलता है और किस कॉन्टेक्स्ट में लोग इस बात को साबित करने पर तुले हुए हैं कि औरतें ही औरतों की सबसे बड़ी दुश्मन हैं। हम यह भी समझेंगे कि इस कथन में कितनी सच्चाई है। 

1. माँ के रूप में

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आज तक यह समझा जाता है कि औरत बेटी नहीं, बेटा चाहती है। जब उसे बेटा होता है तो वह ज़्यादा खुश होती है। उस माँ को ऊपर से खुश देखकर सब धोखा खाते हैं। जब वो प्रेग्नेंट होती है तब परिवार वाले उससे यही एक्सपेक्ट करते हैं कि वो उस घर को बेटे के रूप में चिराग देगी। वो माँ नहीं, उसका परिवार और समाज है, जो बेटा पैदा करने वाली औरत को भाग्यशाली समझता है और बेटी पैदा करने वाली माँ को बेचारी। बेटी की माँ की ज़रूरतों का इतना ध्यान नहीं रखा जाता, जितना एक लड़के की माँ का रखा जाता है, इसीलिए वो माँ खुश नहीं लगती। 

2. दादी के रूप में 

एक धारणा यह भी है कि दादी अपने बेटे के घर में लड़की नहीं, बल्कि लड़का चाहती है। जब दादी एक माँ थी, तब उसे भी इन यातनाओं का सामना करना ही पड़ा होगा और उसने यह भी देखा होगा कि अगर लड़की पैदा हो जाए तो ससुराल वाले कैसा सलूक करते हैं। अकेली दादी तो अपनी बहू को भ्रूण हत्या के लिए नहीं लिजा सकती। अगर उसका बेटा और पति इसमें शामिल हैं तभी ऐसा हो रहा है ना। इससे यह साबित नहीं होता कि औरत ही आने वाली नन्ही जान की दुश्मन है। उसका पिता और दादा भी इसमें उतने ही गुनहगार हैं। 

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3. सास के रूप में 

सास-बहू का रिश्ता और उनके बीच की खट्टी-मीठी बातें तो सबको ही पता हैं। हमारा समाज सास और बहू को एक-दूसरे की पक्की दुश्मन समझता है। इसका कारण साफ-साफ यह है कि माँ अपने बेटे पर अपना पहला अधिकार समझती है और पत्नी अपने पति पर अपना। लेकिन इसमें जितनी गलती उन औरतों की होती है उतनी ही घर के मर्दों की भी। वो इस मसले को सुलझाने की बजाय या तो सिर्फ पत्नी को गलत कहेंगे या फिर इस मुद्दे पर बात ही नहीं करेंगे। अगर पति माँ और बीवी को बिठा कर समझाए और दोनों को उनकी जगह पर सही रखे तो ऐसी नौबत नहीं आएगी। 

4. ननद के रूप में

ननद और भाभी का रिश्ता भी कुछ ऐसा ही है। जब माँ और भाभी में कुछ किन्तु-परन्तु होगा तो बेटी अपनी माँ की साइड ही लेगी। अगर बेटी की शादी अभी नहीं हुई है तो जिस तरह दो बहनों के बीच बचपन में तू-तू मैं-मैं हो जाती है, उसी तरह बहू-बेटी  में भी तो हो सकती है। इसमें दुश्मनी जैसी कोई बात नहीं होती। 

सोचने वाली बात यह है कि किस घर में मतभेद नहीं होते। अगर बाप-बेटे और भाई-भाई की आपस में नहीं बनती तो क्या मर्द एक दूसरे के दुश्मन हैं? अब वक़्त आ गया है इस धारणा को तोड़ने का। यह कभी भी सच नहीं है कि औरतें ही औरतों का नुकसान करती हैं, लेकिन इस समाज में औरतों को एक-दूसरे के लिए बोलने का अधिकार नहीं मिला है। अपने बेटे, भाई, पति या पिता के विरुद्ध जा कर अगर एक औरत दूसरी औरत का साथ देगी तो उसे उस मर्द की नफरत का सामना करना पड़ सकता है, जिसे औरत कभी फेस नहीं करना चाहती। 

औरत ही औरत की दुशमन
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