पीरियड्स पर बात माँ से ही क्यों होती है, पिता से क्यों नहीं?

पीरियड्स के बारे में बात सिर्फ़ माँ-बेटियों तक ही सीमित नहीं होनी चाहिए। जब तक पिता इस डिस्कशन में शामिल नहीं होंगे, तब तक यह नॉर्मल नहीं होगा।

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Dimpy Bhatt
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Why do talk about periods only with mother and not with father

Photograph: (freepik)

भारत में पीरियड्स आज भी एक सेंसिटिव टॉपिक है, और बहुत से लोग इस पर पब्लिक में बात करने में झिझक महसूस करते है। जब किसी लड़की को पहली बार पीरियड्स आते हैं, तो ज़्यादातर इस बारे में बात सिर्फ़ माँ और बेटी के बिच होती है। पिताओं को अक्सर इस बात से बाहर रखा जाता है, जैसे कि यह कोई ऐसा टॉपिक हो जिसमें उनका कोई लेना-देना न हो। सवाल यह है कि पीरियड्स सिर्फ़ महिलाओं का विषय क्यों बना दिया गया है और इसमें पिता शामिल क्यों नहीं होते?   

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पीरियड्स पर बात माँ से ही क्यों होती है, पिता से क्यों नहीं?

1. चुप्पी और झिझक

हमारे सोसाइटी में, पीरियड्स को आज भी शर्म और चुप्पी से जोड़ा जाता है। लड़कों और पुरुषों को बचपन से ही यह सिखाया जाता है कि यह “महिलाओं की बात” है। इसीलिए पिता अक्सर इस टॉपिक से दूर रहते हैं। यह हिचकिचाहट सालों से चली आ रही सोच से आती है जिसमें पीरियड्स पर बात करना अजीब माना जाता है।

2. माँ की ज़िम्मेदारी 

घर पर, पीरियड्स से जुड़ी सारी इनफार्मेशन, केयर और इमोशनल सपोर्ट देने की रिस्पांसिबिलिटी माँ की होती है। ऐसा मान लिया गया है कि माँ ही सब कुछ एक्सप्लेन करेगी और मैनेज करेगी। इससे पिता का रोले अपने आप खत्म हो जाती है, जबकि बेटी की उपब्रिंगिंग और हेल्थ की ज़िम्मेदारी माता-पिता दोनों की होती है।

3. पिता की चुप्पी का असर

जब पिता इस इशू में चुप रहते हैं, तो बेटियों को लगता है कि पीरियड्स कोई ऐसी चीज़ है जिसे छुपाना चाहिए। इससे शर्म और गिल्ट की फीलिंग्स पैदा हो जाती हैं। अगर पिता खुलकर बात करें, तो बेटियाँ समझेंगी किउनकी बॉडी और उसका चेंज नैचुरल हैं और उनमें कुछ भी गलत नहीं है।

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4. बेटों तक गलत मैसेज

जब पिता पीरियड्स के बारे में बात नहीं करते, तो इससे बेटों को भी यह मैसेज जाता है कि यह ऐसा टॉपिक नहीं है जिससे उन्हें कोई मतलब हो। यही सोच अब सोसाइटी में फैल चुकी है। अगर पिता पीरियड्स के बारे में खुलकर बात करेंगे, तो बेटे इसे एक नॉर्मल बायोलॉजिकल प्रोसेस समझेंगे, और महिलाओं के लिए उनका सम्मान बढ़ेगा।

5. बदलाव की शुरुआत घर से

पीरियड्स के बारे में घर से ही खुलकर बातचीत शुरू हो सकती है। अगर पिता सवाल पूछें, फैक्ट्स जानें और एम्पथी दिखाएं, तो माहौल अपने आप बदल सकता है। पीरियड्स के बारे में बात सिर्फ़ माँ-बेटियों तक ही सीमित नहीं होनी चाहिए। जब तक पिता इस डिस्कशन में शामिल नहीं होंगे, तब तक यह नॉर्मल नहीं होगा। इससे न सिर्फ़ बेटियों का सेल्फ-एस्टीम बढ़ेगा, बल्कि सोसाइटी में अच्छे चेंज लाने में भी मदद मिलेगी।

सोसाइटी इमोशनल सपोर्ट