जानिए मेनोपॉज़ एजुकेशन आज भी इतनी लिमिटेड क्यों है?

मेनोपॉज़ पर बात न होने से परिवार के लोग भी यह नहीं समझ पाते कि महिला किस चेंज से गुजर रही है। वर्कप्लेस पर भी इस फेज़ के लिए कोई सपोर्ट सिस्टम नहीं होता।

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Dimpy Bhatt
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why menopause education is still so limited

Photograph: (Freepik)

मेनोपॉज़ महिलाओं की लाइफ का एक नैचुरल और ज़रूरी फेज़ है, लेकिन इसके बावजूद इस पर इनफार्मेशन और खुली बातचीत आज भी बहुत लिमिटेड है। पीरियड्स और प्रेग्नेंसी पर तो धीरे-धीरे बातें होने लगी हैं, लेकिन मेनोपॉज़ आते ही सोसाइटी में एक अजीब सी चुप्पी छा जाती है। कई महिलाएँ इस दौर से बिना सही इनफार्मेशन, सपोर्ट और गाइडेंस के गुज़रती हैं, जिससे उनका फिज़िकल और मेंटल हेल्थ दोनों पर असर होता है।

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जानिए मेनोपॉज़ एजुकेशन आज भी इतनी लिमिटेड क्यों है?

1. ऐज से जुड़ी चुप्पी 

मेनोपॉज़ को अक्सर एजिंग से जोड़ दिया जाता है और ऐज पर बात करना आज भी उनकंफर्टबले माना जाता है। महिलाओं को ऐसा महसूस कराया जाता है कि अब उन्हें अपनी प्रोब्लेम्स को “नॉर्मल” मानकर सह लेना चाहिए। इसी शर्म और चुप्पी की वजह से मेनोपॉज़ एजुकेशन खुलकर सामने नहीं आ पाती।

2. हेल्थ सिस्टम का सीमित फोकस

ज़्यादातर हेल्थ एजुकेशन पीरियड्स और रिप्रोडक्टिव एज पर ही खत्म हो जाती है। जैसे ही महिला मेनोपॉज़ की ऐज में पहुँचती है, उसकी प्रोब्लेम्स को सीरियसली नहीं लिया जाता। हॉट फ्लैश, नींद की कमी, मूड स्विंग्स या थकान को अक्सर “हॉर्मोनल है, झेल लो” कहकर टाल दिया जाता है।

3. महिलाओं की प्रोब्लेम्स को नॉर्मल मान लेना

सोसाइटी में यह सोच डीपली बैठ चुकी है की अगर महिला तकलीफ में है तो यह उसकी रिस्पांसिबिलिटी है कि वो एडजस्ट करे। मेनोपॉज़ के दौरान होने वाले चेंज को बीमारी नहीं, बल्कि मजबूरी मान लिया जाता है। इसी वजह से सही इनफार्मेशन देने की ज़रूरत को भी नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है।

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4. परिवार और वर्कप्लेस में समझ की कमी

मेनोपॉज़ पर बात न होने से परिवार के लोग भी यह नहीं समझ पाते कि महिला किस चेंज से गुजर रही है। वर्कप्लेस पर भी इस फेज़ के लिए कोई सपोर्ट सिस्टम नहीं होता। जब माहौल समझदार नहीं होता, तो महिलाएँ सवाल पूछने या मदद माँगने से बचने लगती हैं।

5. महिलाओं की अपनी चुप्पी

कई महिलाएँ खुद भी अपनी प्रोब्लेम्स को छोटा मान लेती हैं। उन्हें लगता है कि यह फेज सबको झेलना पड़ता है, इसलिए शिकायत करने का कोई मतलब नहीं। यही चुप्पी अगली पीढ़ी तक ट्रांसफर हो जाती है और मेनोपॉज़ एजुकेशन वहीं रह जाती है। मेनोपॉज़ पर सीमित जानकारी सिर्फ़ एक हेल्थ इश्यू नहीं, बल्कि सोच और सिस्टम दोनों की कमी को दिखाती है। जब तक इस फेज़ को खुलकर समझने और समझाने की कोशिश नहीं होगी, तब तक लाखों महिलाएँ इस चेंज से अकेले स्ट्रगल करती रहेंगी।

मेनोपॉज मूड स्विंग्स