“लोग क्या कहेंगे” का डर: कैसे यही सोच महिलाओं को अब्यूसिव शादी में बांधे रखती है?

अब्यूसिव रिश्ते में फंसी कई महिलाएं फिनांकिअल्ली रूप से अपने पार्टनर पर डिपेंडेंट होती हैं। जॉब न होना या लौ इनकम होना उन्हें इन्सेक्युरे महसूस कराता है।

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Dimpy Bhatt
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how societal pressure keeps women in abusive marriages

Shadi Photograph: (Freepik)

सोसाइटी में आज भी कई महिलाएं सिर्फ “लोग क्या कहेंगे” के डर से अब्यूसिव शादी में बनी रहती हैं। इज्जत, परिवार और बच्चों के नाम पर सहा जाने वाला मेन्टल और फिजिकल एब्यूज उनके सेल्फ एस्टीम और मेन्टल हेल्थ को डीपली इम्पैक्ट करता है। इस सोच को बदलना और सपोर्ट सिस्टम मजबूत करना बेहद जरूरी है।

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“लोग क्या कहेंगे” का डर: कैसे यही सोच महिलाओं को अब्यूसिव शादी में बांधे रखती है?

सोशल प्रेशर और इज्जत का बोझ

कई परिवारों में शादी को “समझौता” मान लिया जाता है। अगर रिश्ते में वायलेंस या डिसरेस्पेक्ट हो, तब भी महिला से उम्मीद की जाती है कि वो घर बचाए। सोसाइटी की नजरों में डाइवोर्स या सेपरेशन को आज भी नेगटिवेली देखा जाता है। “लोग क्या कहेंगे” का डर महिलाओं को अपना पैन छुपाने पर मजबूर कर देता है, जिससे प्रॉब्लम और गहरी हो जाती है।

फाइनेंसियल डिपेंडेंस की मजबूरी

अब्यूसिव रिश्ते में फंसी कई महिलाएं फिनांकिअल्ली रूप से अपने पार्टनर पर डिपेंडेंट होती हैं। जॉब न होना या लौ इनकम होना उन्हें इन्सेक्युरे महसूस कराता है। ऐसे में सोसाइटी की क्रिटिसिज्म का डर और भी भारी लगने लगता है। उन्हें लगता है कि बाहर निकलने पर लोग सवाल करेंगे और फाइनेंसियल इंस्ताबिलिटी का सामना करना पड़ेगा।

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बच्चों और परिवार की चिंता

बहुत-सी महिलाएं बच्चों के फ्यूचर के नाम पर सब कुछ सहन करती रहती हैं। उन्हें डर होता है कि अलग होने से बच्चों पर गलत असर पड़ेगा या परिवार बदनाम होगा। लेकिन लगातार स्ट्रेस और वायलेंस वाले माहौल में बच्चों का मेन्टल डेवलपमेंट इम्पैक्ट होता है। फिर भी “परिवार टूट जाएगा” की सोच उन्हें उसी रिश्ते में बांधे रखती है।

मेटल और इमोशनल इम्पैक्ट 

लगातार डिसरेस्पेक्ट, डर और स्ट्रेस से सेल्फ कॉन्फिडेंस वीक हो जाता है। कई महिलाएं खुद को ही ब्लामे देने लगती हैं और मान बैठती हैं कि शायद गलती उन्हीं की है। यह इमोशनल एब्यूज उन्हें अंदर से ब्रेक कर देता है। टाइम के साथ डिप्रेशन, एंग्जायटी और लौ सेल्फ एस्टीम  जैसी प्रॉब्लम हो  सकती हैं।

बदलाव की जरूरत और सपोर्ट सिस्टम

सबसे जरूरी है ये समझना कि किसी भी तरह का अब्यूज अक्सेप्टबले नहीं है। परिवार, दोस्तों और सोसाइटी को महिलाओं का साथ देना चाहिए, न कि उन्हें जज करना चाहिए। लीगल मदद, काउंसलिंग और महिला हेल्पलाइन जैसी सुविधाएं उपलब्ध हैं, जिनसे सहायता ली जा सकती है। सेल्फ रेलिएन्ट बनना और अपनी सेफ्टी को प्रिऑरिटीज़ देना पहला स्टेप है।

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शादी मेन्टल हेल्थ सोसाइटी