Parenting: बढ़ती चाहतों के बीच परवरिश और बच्चों की जरूरत-ज़िद का संतुलन

आज के भारतीय माता-पिता बच्चों की बढ़ती चाहतों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं। वे सीमाएँ तय करने, पैसों की समझ देने और अनुभवों को महत्व देकर बच्चों को जिम्मेदार और संतुष्ट बनाना सिखा रहे हैं।

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Tamanna Soni
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Photograph: Via (Shutterstock)

आज के समय में बच्चों की परवरिश पहले से कहीं ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो गई है। सोशल मीडिया, विज्ञापन और साथियों के प्रभाव के कारण बच्चों की इच्छाएँ तेजी से बढ़ रही हैं। खिलौनों से लेकर गैजेट्स और ब्रांडेड चीज़ों तक, “चाहत” और “जरूरत” के बीच की रेखा धुंधली होती जा रही है। ऐसे में भारत के युवा माता-पिता समझदारी और नई सोच के साथ इस स्थिति को संभालने की कोशिश कर रहे हैं।

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Parenting: बढ़ती चाहतों के बीच परवरिश और बच्चों की जरूरत-ज़िद का संतुलन

बदलता बचपन और बढ़ती खपत

आज के बच्चों का बचपन डिजिटल दुनिया से जुड़ा हुआ है। वे कम उम्र में ही नए ट्रेंड्स और ब्रांड्स से परिचित हो जाते हैं। इसका असर यह होता है कि वे बार-बार नई चीज़ों की मांग करने लगते हैं।

युवा माता-पिता समझते हैं कि हर मांग पूरी करना समाधान नहीं है। इसलिए वे बच्चों को यह सिखाने पर ध्यान दे रहे हैं कि हर चीज़ जरूरी नहीं होती और संतोष भी एक महत्वपूर्ण मूल्य है।

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“ना” कहना भी है प्यार का हिस्सा

पहले कई माता-पिता बच्चों की खुशी के लिए उनकी हर इच्छा पूरी करने की कोशिश करते थे। लेकिन अब युवा माता-पिता समझ रहे हैं कि सीमाएँ तय करना जरूरी है।

वे बच्चों को प्यार से समझाते हैं कि हर बार तुरंत चीज़ मिलना संभव नहीं है। इससे बच्चों में धैर्य और चीज़ों की अहमियत समझने की आदत विकसित होती है।

अनुभवों को चीज़ों से ज्यादा महत्व

नई पीढ़ी के माता-पिता बच्चों को केवल वस्तुएँ देने के बजाय अनुभवों पर ध्यान दे रहे हैं। परिवार के साथ समय बिताना, घूमना, खेलना और रचनात्मक गतिविधियाँ बच्चों को अधिक खुशी देती हैं।

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इससे बच्चों का ध्यान भौतिक चीज़ों से हटकर यादों और रिश्तों की ओर जाता है, जो लंबे समय तक उनके व्यक्तित्व को सकारात्मक रूप से प्रभावित करता है।

पैसे की समझ बचपन से

कई माता-पिता अब बच्चों को छोटी उम्र से ही पैसों की कीमत समझाने लगे हैं। पॉकेट मनी, बचत की आदत और जरूरत के हिसाब से खर्च करना जैसी बातें धीरे-धीरे सिखाई जा रही हैं।

इससे बच्चे जिम्मेदारी सीखते हैं और impulsive खरीदारी से बचना सीखते हैं।

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स्क्रीन और सोशल मीडिया का संतुलन

बच्चों की बढ़ती इच्छाओं का एक बड़ा कारण सोशल मीडिया भी है। विज्ञापन और इन्फ्लुएंसर्स बच्चों को नई चीज़ों के लिए आकर्षित करते हैं।

युवा माता-पिता स्क्रीन टाइम सीमित करने, कंटेंट पर नजर रखने और ऑफलाइन गतिविधियों को बढ़ावा देने जैसे कदम उठा रहे हैं, ताकि बच्चों का ध्यान संतुलित रहे।

माता-पिता खुद बन रहे उदाहरण

बच्चे वही सीखते हैं जो वे घर में देखते हैं। इसलिए कई माता-पिता खुद भी सोच-समझकर खरीदारी करने लगे हैं और अनावश्यक खर्च से बचने की कोशिश करते हैं।

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जब बच्चे माता-पिता को संतुलित जीवनशैली अपनाते देखते हैं, तो वे भी धीरे-धीरे वही आदतें सीखते हैं।

बातचीत और समझ है सबसे बड़ा समाधान

बच्चों की इच्छाओं को नज़रअंदाज़ करने के बजाय उनके साथ खुलकर बातचीत करना अधिक प्रभावी तरीका साबित हो रहा है। माता-पिता बच्चों से पूछते हैं कि उन्हें कोई चीज़ क्यों चाहिए और फिर उन्हें जरूरत और इच्छा का फर्क समझाते हैं।

इससे बच्चे खुद निर्णय लेने की क्षमता विकसित करते हैं और जिद कम होने लगती है।

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बदलती परवरिश की सकारात्मक दिशा

आज के युवा माता-पिता बच्चों की हर इच्छा पूरी करने के बजाय उन्हें जिम्मेदार और संतुलित बनाना चाहते हैं। वे समझते हैं कि सही मूल्य और आदतें सिखाना किसी भी वस्तु से ज्यादा महत्वपूर्ण है।

यह नई परवरिश बच्चों को केवल खुश ही नहीं, बल्कि समझदार और आत्मनिर्भर भी बना रही है। जरूरत और चाहत के बीच संतुलन सिखाकर माता-पिता बच्चों को एक बेहतर और संतुलित भविष्य के लिए तैयार कर रहे हैं।

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