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Photograph: (freepik)
एक टाइम था जब पेरिमेनोपॉज़ को 40 के बाद शुरू होने वाला फेज़ माना जाता था। लेकिन आज ये कांसेप्ट तेज़ी से बदल रहा है। अब 30 की उम्र के आसपास ही कई महिलाएँ इर्रेगुलर पीरियड्स, मूड स्विंग्स, थकान और नींद की प्रॉब्लम से जूझने लगती हैं—और बाद में समझ आता है कि यह पेरिमेनोपॉज़ की शुरुआत हो सकती है। यह बदलाव सिर्फ़ मेडिकल नहीं, बल्कि लाइफस्टाइल और सोशल प्रेशर से भी जुड़ा हुआ है।
न्यू टर्निंग पॉइंट: क्यों 30 की उम्र में ही पेरिमेनोपॉज़ से जूझ रही हैं ज़्यादातर महिलाएं
हार्मोनल डिसरप्शन की जल्दी शुरुआत
पेरिमेनोपॉज़ की सबसे बड़ी वजह हार्मोनल इम्बैलेंस है। आज की तेज़ रफ्तार लाइफ में स्ट्रेस, इर्रेगुलर स्लीप और गलत खानपान एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन जैसे हार्मोन्स को प्रभावित कर रहे हैं। जब ये हार्मोन जल्दी इम्बैलेंस होने लगते हैं, तो बॉडी पेरिमेनोपॉज़ जैसे संकेत देने लगता है, भले ही ऐज कम ही क्यों न हो।
स्ट्रेस और मल्टी-टास्किंग का प्रेशर
30 की उम्र आज सिर्फ़ एक नंबर नहीं रह गई है। करियर बनाना, फाइनेंशियल स्टेबिलिटी, मैरिज, बच्चे और सोशल एक्सपेक्टेशंस—इन सबका प्रेशर इसी उम्र में सबसे ज़्यादा होता है। लगातार स्ट्रेस में रहने से कोर्टिसोल हार्मोन बढ़ता है, जो सीधे रिप्रोडक्टिव हार्मोन्स को प्रभावित करता है। इसका रिजल्ट होता है, पीरियड्स में बदलाव, एंग्जायटी और एनर्जी की कमी।
लाइफस्टाइल चॉइसेज़ और हेल्थ हैबिट्स
आज की महिलाएँ पहले से ज़्यादा इंडिपेंडेंट हैं, लेकिन इसके साथ स्क्रीन टाइम, प्रोसेस्ड फूड, कैफीन और फिज़िकल इनएक्टिविटी भी बढ़ी है। ये सभी फैक्टर्स बॉडी के हार्मोनल बैलेंस को धीरे-धीरे बिगाड़ते हैं। स्मोकिंग और अल्कोहल का बढ़ता चलन भी पेरिमेनोपॉज़ की जल्दी शुरुआत से जुड़ा माना जाता है।
पीरियड्स और बॉडी सिग्नल्स को इग्नोर करना
कई महिलाएँ 30 की उम्र में अपने बॉडी के बदलते संकेतों को “नॉर्मल स्ट्रेस” समझकर इग्नोर कर देती हैं। इर्रेगुलर पीरियड्स, हैवी ब्लीडिंग, नींद की परेशानी या अचानक वेट गेन—ये सब पेरिमेनोपॉज़ के शुरुआती संकेत हो सकते हैं। सही टाइम पर पहचान न होने से यह फेज़ ज़्यादा मुश्किल बन सकता है।
क्या किया जा सकता है आगे
30 की उम्र में पेरिमेनोपॉज़ का मतलब ये नहीं कि बॉडी फेल हो रहा है। ज़रूरत है सही इनफार्मेशन और टाइम पर एक्शन की। बैलेंस्ड डाइट, रेगुलर एक्सरसाइज़, स्ट्रेस मैनेजमेंट और डॉक्टर से सलाह इस फेज़ को संभालने में मदद कर सकती है। सबसे ज़रूरी है—अपने बॉडी की बात सुनना और उसे लाइट्ली में न लेना।
30 की उम्र में पेरिमेनोपॉज़ आज की न्यू रियलिटी बनती जा रही है। इसे डर की तरह नहीं, बल्कि समझ और केयर के साथ अपनाने की ज़रूरत है—ताकि महिलाएँ इस टर्निंग पॉइंट को मजबूती के साथ पार कर सकें।
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