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मेनोपॉज़ आमतौर पर 45 से 50 की ऐज के बीच आता है, लेकिन जब यह प्रोसेस 40 साल से पहले शुरू हो जाए, तो इसे अर्ली मेनोपॉज़ कहा जाता है। आज के टाइम में स्ट्रेस, लाइफस्टाइल, हेल्थ इश्यूज़ और जेनेटिक फैक्टर्स की वजह से कई महिलाएँ अर्ली मेनोपॉज़ का सामना कर रही हैं। प्रॉब्लम की बात यह है कि ज़्यादातर महिलाएँ इसके शुरुआती सिम्पटम्स को नज़रअंदाज़ कर देती हैं या उन्हें ऐज का असर मानकर टाल देती हैं। सही टाइम पर पहचान और सही स्टेप उठाना बहुत ज़रूरी है।
अर्ली मेनोपॉज़ को कैसे पहचानें और आगे क्या करें?
पीरियड्स पैटर्न में अचानक चेंज
अर्ली मेनोपॉज़ के सबसे पहले सिम्पटम्स इर्रेगुलर पीरियड्स है। कभी बहुत ज़्यादा गैप आना, कभी बहुत कम टाइम में पीरियड्स होना या ब्लीडिंग का अचानक कम या ज़्यादा हो जाना—ये सब संकेत बॉडी में हो रहे हार्मोनल चेंज की ओर इशारा करते हैं। अगर ये चेन्ज लगातार कुछ मन्थस तक बने रहें, तो इसे नॉर्मल समझकर इग्नोर नहीं करना चाहिए।
हॉट फ्लैश और नाइट स्वेट्स
बिना किसी वजह अचानक बहुत ज़्यादा गर्मी लगना, पसीना आना या रात में बार-बार पसीने से भीगकर नींद टूटना अर्ली मेनोपॉज़ का संकेत हो सकता है। कई महिलाएँ इसे मौसम या थकान का असर मान लेती हैं, लेकिन अगर ये प्रॉब्लम बार-बार हो रही है, तो यह हार्मोनल इम्बैलेंस का संकेत है। अर्ली मेनोपॉज़ को टाइम रहते पहचान लेना महिलाओं को फिजिकल और मेन्टल दोनों रूप से स्ट्रांग बनाता है।
मूड स्विंग्स और मेंटल बदलाव
अर्ली मेनोपॉज़ सिर्फ़ बॉडी पर नहीं, मंद पर भी असर डालता है। अचानक चिड़चिड़ापन, उदासी, एंग्ज़ायटी या बिना वजह रोने का मन होना आम सिम्पटम्स हैं। कई महिलाएँ खुद को इमोशनली वीक महसूस करने लगती हैं और इसका रीज़न समझ नहीं पातीं। इस सिचुएशन को नजरअंदाज करना मेंटल हेल्थ को और प्रभावित कर सकता है।
अर्ली मेनोपॉज़ के बाद आगे क्या करें
सबसे पहला स्टेप है खुद को ब्लामे करना बंद करे।अर्ली मेनोपॉज़ कोई गलती नहीं है। टाइम पर डॉक्टर से सलाह लेना बहुत ज़रूरी है ताकि हार्मोन लेवल, बोन हेल्थ और ओवरऑल हेल्थ की सही जांच हो सके। सही गाइडेंस से आगे की परेशानियों को काफी हद तक कंट्रोल किया जा सकता है।
लाइफस्टाइल में छोटे लेकिन ज़रूरी चेंज
बैलेंस्ड डाइट, रेगुलर एक्सरसाइज़, स्ट्रेस मैनेजमेंट और पूरी नींद अर्ली मेनोपॉज़ को मैनेज करने में बहुत हेल्प करती है। साथ ही, अपनी फीलिंग्स को दबाने के बजाय परिवार या किसी ट्रस्टेड पर्सन से बात करना भी ज़रूरी है। सही इनफार्मेशन, सही सपोर्ट और खुद की सेल्फ केयर से इस फेज़ को भी बेहतर तरीके से मैनेज किया जा सकता है।
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