पीरियड्स टॉक सिर्फ़ बेटियों से क्यों? बेटों को भी होनी चाहिए इसकी जानकारी

बेटे और बेटियों दोनों को पीरियड्स के बारे में सही जानकारी मिलनी चाहिए क्योंकि यह एक नैचुरल बॉडी प्रोसेस है और इसमें शर्म की कोई बात नहीं है। 

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Dimpy Bhatt
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Why periods talk only with daughters sons should also know about it

Photograph: (freepik)

अभी भी, हमारे समाज में पीरियड्स के बारे में बातचीत ज़्यादातर लड़कियों तक ही सीमित है। क्योंकि इसे "औरतों का मामला" माना जाता है, इसलिए बेटों को इससे दूर रखा जाता है। लेकिन यह सोच न सिर्फ़ अधूरी है, बल्कि नुकसानदेह भी है। बेटे और बेटियों दोनों को पीरियड्स के बारे में सही जानकारी मिलनी चाहिए क्योंकि यह एक नैचुरल बॉडी प्रोसेस है और इसमें शर्म की कोई बात नहीं है। 

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पीरियड्स टॉक सिर्फ़ बेटियों से क्यों? बेटों को भी होनी चाहिए इसकी जानकारी

1. पीरियड्स सिर्फ़ लड़कियों का नहीं, पूरे समाज का इशू है

जब पीरियड्स को सिर्फ़ बेटियों की ज़िम्मेदारी बना दिया जाता है, तो बेटों में गलतफहमियाँ पैदा होती हैं। या तो उन्हें पूरी जानकारी नहीं होती या वे इसे गलत समझते हैं। अगर बेटों को बचपन से ही यह सिखाया जाए कि पीरियड्स एक नॉर्मल फिज़िकल प्रोसेस है, तो वे ज़्यादा सेंसिटिव और समझदार बन सकते हैं।   

2. रेस्पेक्ट और एम्पैथी की शुरुआत 

पीरियड्स की वजह से, लड़कियों को अक्सर घर या स्कूल में शर्मिंदगी महसूस होती है, कभी मज़ाक बनता है, और कभी चुप रहने की सलाह दी जाती है। अगर बेटों को पहले से सही जानकारी दी जाए तो वे मज़ाक उड़ाने के बजाय सपोर्ट करना सीखते हैं। एम्पैथी किसी जेंडर से नहीं, समझ से आती है।

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3. आने वाले रिश्तों में बनेगी बेहतर समझ

आज के बेटे ही कल के पार्टनर, पति, भाई और पिता बनते हैं। अगर उन्हें पीरियड्स के बारे में सही जानकारी होगी, तो वे रिश्तों में ज़्यादा समझदार और सपोर्टिव बनेंगे। वे पहचानेंगे कि पीरियड्स के दौरान मूड स्विंग्स, पैन या थकान होना कोई "ड्रामा" नहीं, बल्कि बॉडी की ज़रूरतें हैं।

4. टैबू टूटेगा, तो सवाल पूछना आसान होगा

जब पीरियड्स के बारे में खुलकर बात होगी तो लड़कियों को सवाल पूछना आसान लगेगा। पैड, पैन या हेल्थ प्रॉब्लम पर चुप्पी नहीं रहेगी। बेटों की मौजूदगी में भी पीरियड्स  पर बात होना इसे नॉर्मलाइज़ करता है और डर को खत्म करता है।

5. सही एजुकेशन से बदलेगी सोच

पीरियड्स एजुकेशन सिर्फ़ स्कूल की किताबों तक सीमित नहीं होनी चाहिए। इसकी शुरुआत घर से करना बहुत ज़रूरी है। एक हेल्दी और अवेयर जेनरेशन तब बनती है जब माता-पिता अपने बेटों को भी वही जानकारी देते हैं जो वे अपनी बेटियों को देते हैं। पीरियड्स को लेकर जो चुप्पी है, उसका बोझ सिर्फ़ लड़कियों पर ही पड़ता है। अगर बेटों को भी पूरी जानकारी दी जाए तो समाज ज़्यादा समझदार, और बराबरी वाला बन सकता है।

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पीरियड्स मूड स्विंग्स